संपूर्ण समाज का संगठन है संघ : मनमोहन जी वैद्य - Man Ki Baat अभिव्यक्ति की आजादी

Breaking

Advertisements

Wednesday, 5 June 2019

संपूर्ण समाज का संगठन है संघ : मनमोहन जी वैद्य





लेखक : मनमोहन जी वैद्य

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के समय से ही स्वयं को संपूर्ण समाज का संगठन मानता और बताता रहा है। देश को मिली स्वतंत्रता के पश्चात भी संघ की इस भूमिका में कोई अंतर नहीं आया। इसलिए स्वतंत्रता के पश्चात 1949 में संघ का जो संविधान बना उसमें भी यह स्पष्ट है कि यदि कोई स्वयंसेवक राजनीति में सक्रिय होना चाहता है तो किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य बन सकता है। यह संविधान भारतीय जनसंघ की स्थापना से पहले बना है। जन संघ की स्थापना के बाद भी उसमें अनेक स्वयंसेवक  और प्रचारकों को देने के बाद भी इसमें कोई बदल नहीं हुआ ।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में एकाधिक दल का होना स्वाभाविक ही है। संघ के संपूर्ण समाज का संगठन होने के नाते यह भी स्वाभाविक ही है कि समाज का कोई भी क्षेत्र संघ से अछूता नहीं रहेगा और स्वयंसेवक समाज एवं जीवन के हर क्षेत्र में अपनी राष्ट्रीय दृष्टि लेकर जाएंगे। चुकी कुछ स्वयंसेवक राजनीति में सक्रिय हैं इसलिए संघ राजनीति करता है या वह राजनीतिक दल है यह कहना अनुचित और गलत होगा । राजनीतिक दल समाज के केवल एक हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं और समाज का दूसरा हिस्सा भी होता है। संघ जब संपूर्ण समाज का संगठन है जो 'संपूर्ण' किसी एक 'हिस्से' का हिस्सा कैसे बन सकता है?

1925 में संघ की स्थापना के बाद 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेते समय डॉक्टर हेडगेवार अन्य स्वयंसेवकों के साथ सत्याग्रह के लिए जाने से पहले सरसंघचालक का दायित्व अपने सहकारी डॉक्टर परांजपे को सौंप गए थे। वह व्यक्तिगत तौर पर सत्याग्रह में सहभागी हुए थे और उसके लिए उन्हें 1 वर्ष सश्रम कारावास की सजा हुई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात गृह मंत्री सरदार पटेल द्वारा संघ को कांग्रेस में विलीन करने का प्रस्ताव आने पर गुरुजी ने उसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि संघ एक दल बनने के बजाय संपूर्ण समाज का संगठन करना चाहता था । राजनीति में एक राष्ट्रीय विचार के दल की आवश्यकता को ध्यान में रखकर संघ को रिक्तता  पूरी करनी चाहिए, ऐसा डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा प्रस्ताव आने पर गुरुजी ने कहा कि यह काम आप कीजिए संघ आपकी सहायता करेगा परंतु संघ संपूर्ण समाज के संगठन का अपना कार्य ही करता रहेगा।

आपातकाल के दौरान 1977 के लोकसभा चुनाव के समय जनता पार्टी की सरकार बनाने में संघ स्वयंसेवकों का महत्वपूर्ण योगदान था। कई दलों को लेकर बनी जनता पार्टी में अर्थात सत्ता में सहभागी होने का आकर्षक प्रस्ताव आने पर भी तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने उसे अस्वीकार करते हुए कहा कि विशिष्ट परिस्थिति में संघ इस चुनाव में सहभागी हुआ था अब संघ अपने नियत कार्य संपूर्ण समाज के संगठन के कार्य में ही लगेगा। यह सब समझने के लिए समाज में संगठन नहीं संपूर्ण समाज को संगठित करने के संघ के विचार के पीछे की भूमिका को समझना आवश्यक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 2018 की प्रतिनिधि सभा में ज्येष्ठ स्वयंसेवक एमजी वैद्य आए थे उस दिन का 95 जन्मदिन था। वह बाल्यावस्था से ही संघ के स्वयंसेवक बने हुए हैं। प्रतिनिधि सभा में अपने विचार व्यक्त करते समय उन्होंने कहा संघ को समझना आसान नहीं है। पश्चिम के द्वंद्वात्मक सोच से संघ को समझना संभव नहीं है भारतीय सोच की एकात्म दृष्टि से ही आप संघ को समझ सकते हैं।

ईशावास्योपनिषद के पांचवें मंत्र में आत्म तत्व का वर्णन करते समय उपनिषद कार कहते हैं  "वह आत्म तत्व से चलता है और नहीं भी चलता है वह दूर है और समीप भी है वह सब के अंतर्गत है और वही सब के बाहर भी है"  । यह बात परस्पर विरोधी लगने वाली है फिर भी संदेह कुछ ऐसी ही बात संघ पर भी लागू होती है संघ संपूर्ण समाज का संगठन है समाज में विभिन्न क्षेत्र है संघ इनमें से किसी एक क्षेत्र का अंग या संगठन नहीं है।
सामाजिक, सांस्कृतिक , शिक्षा, राजनीति सेवा, धार्मिक आदि सभी क्षेत्रों में सक्रिय होते हुए भी संघ इनमें से केवल एक का संगठन नहीं है। इससे ऊपर भी कुछ है पुरुष सूक्त में कहा गया है कि वह पृथ्वी सहित संपूर्ण विश्व में व्याप्त होकर भी 10 उंगली शेष बचता है। इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि वैज्ञानिकों ने एक समय यह कहा था कि अनु अविभाज्य है फिर उन्होंने कहा कि अनु विभाज्य है और उसमें मुख्यतः तीन कण होते हैं इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन फिर कहने लगे कि 3 ही नहीं और भी अनेक सूक्ष्म कण होते हैं फिर भी कहने लगे वह कण नहीं तरंग के समान गुणधर्म दिखाते हैं आगे और खोज हुई तो कहने लगे कि वे दोनों है कण भी है तरंग भी।  वैज्ञानिक हाइजनबर्ग ने कहा जी यह निश्चित ही है कि वह कण है या तरंग ?
यही बात ईशावास्योपनिषद भी कहता है इसे समझेंगे तो भारतीय चिंतन की एकात्मक दृष्टि को आप समझ सकेंगे तो ही संघ के असली स्वरूप को आप समझ सकेंगे एमजी वैद्य जी ने संघ की भूमिका को इसी तरह समझाया।

संपूर्ण समाज का संगठन होने के और राजनीतिक क्षेत्र समाज का एक अंग होने के नाते इस क्षेत्र में भी संघ स्वयंसेवक सक्रिय होंगे। चुनाव लोकतंत्र का उत्सव के कारण इस में अधिकाधिक मतदान हो वह स्थानीय मुद्दे या छोटे विषय से ऊपर उठकर राष्ट्रीय दृष्टिकोण पर हो और समुचित विचार कर राष्ट्र के हित में लोग मतदान करें ऐसा जन जागृति संघ सेवक एक जागृत नागरिक होने के नाते करते हैं।

संघ का संविधान किसी भी स्वयंसेवक को किसी राजनीतिक दल या उम्मीदवार का प्रचार करने से रोकता नहीं है। परंतु 90% स्वयंसेवक किसी दल या उम्मीदवार के नाम का पर्चा न लेकर राष्ट्रीय मुद्दों के बारे में जागरण करते दिखेंगे । ऐसा होते हुए भी संघ एक राजनीतिक दल या राजनीतिक दल का हिस्सा नहीं बनता वह संपूर्ण समाज का संगठन ही है । यही है भारत की सर्व समावेशी एकात्म सर्वाधिक विचार का मार्ग संघ ही सही अर्थों में समझने के लिए इस दर्शन को समझना आवश्यक है।

No comments:

Post a Comment

Loading...